22 दिन की बस यात्रा - भाग 1
यात्रा संस्मरण - भाग 1
आप सब घुमक्कड़ साथियों को वर्ष 1979 में लिए चलता हू जब मैंने 22 दिन लगातार बस में यात्रा की थी। यात्रा का आरंभ दिल्ली से था और आगरा, ग्वालियर, मुंबई आदि होते हुए 22 दिन बाद समाप्ति भी दिल्ली में ही हुई। इस यात्रा के समय मेरी आयु 13 वर्ष थी साथ में मेरे माता पिता, छोटा भाई अंशुमान व 3 वर्ष की मेरी छोटी बहन के साथ साथ मेरी नानी भी थी। यात्रा के दौरान कई तरह के रोचक अनुभव हुए। कुछ भूल भी गया होउंगा पर कुछ बहुत अच्छी तरह से याद भी है। हमारी यात्राबस साधारण 2x3 की सीट्स वाली ही थी और यात्री भी प्राय मध्यम श्रेणी के गवर्नमेंट एम्पलॉइज ही थे। जिनमे क्लर्क, अध्यापक प्राध्यापक मुख्य थे।
यात्रा का शुभारंभ 28 मई 1979 सायं कश्मीरी गेट से हुआ सवारी इकट्ठे होते होते रात 11 बज गए जब दिल्ली से बस बाहर निकली। अगले सुबह सुबह नींद खुली तो आगरा पहुंचे थे। फतेहपुर सीकरी, सिकंदरा, ताज महल के दीदार करके बस आगे बढ़ी ग्वालियर किला बस की खिड़की से ही देखा। ग्वालियर के बाद आगे बढ़े गुना की तरफ तो रास्ते में एक पुल टूटा था। रात हो चली थी केवल इतना याद है कि सड़क पर ही चादर बिछा कर सोये। एक नई बात और पता चली कि दिल्ली से 2 बसे निकली थी दूसरी बस वाया जयपुर निकल गई। ड्राइवर के पास तेल डलवाने के भी पैसे नहीं थे। उन दिनों मोबाइल तो दूर टेलीफोन भी बहुत कम थे और बड़ी मुश्किल से उसने अपने दिल्ली ऑफिस से संपर्क किया। आफिस वालों ने उसे किसी तरह मुंबई पहुचने के लिए कहा।
अगले दिन किसी तरह वहां से निकले और दोपहर बाद उज्जैन पहुंचे। शिप्रा जी में स्नान व महाकाल के दर्शन करते हुए इंदौर होते हुए निकले। सुबह अजंता पहुंच गए गुफाओं के दर्शन कर शाम को एलोरा। सिर्फ कैलाश मंदिर ही देख पाए। घृणेश्वर मंदिर के इतने पास से निकले पर दर्शन ना कर सके। ग्रुप टूर में कभी कभी इतना नुक़सान तो हो ही जाता है। खैर रात को औरंगाबाद से चल कर सुबह सुबह नासिक पहुंच गए।
गोदावरी पर बने घाट देख कर मेरी माता जी का मन कपड़े धोने के लिए ललचा उठा। में अपने पापा के साथ स्नान का आनंद लेने में लग गया। थोड़ी देर में शोर शराबा हुए तो देखते है कि माता जी ने एक औरत को पकड़ रखा है, जो कि हमारा एक बैग उठा कर भाग रही थी। इसी बैग में ही हमारे पैसे, घड़ी आदि थे। समय पर निगाह पदने से बच गए वरना वहीं सारा मोह माया हो जाना था। नासिक में गोरे काले राम, सीता रसोई, मुक्तिधाम के दर्शन किए और बस निकल चली अगले गंतव्य मुंबई की ओर।
क्रमशः


Very good journey. Waiting for other parts.
ReplyDeleteThanks for your precious comments। Other parts will be following soon
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ReplyDeleteIss yatra ke aage ke safar ka intezar rahega...aapke sath iss safar ka anand hum bhi lenge
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ReplyDeleteसर्वप्रथम आपको दिल से नमन और मनस्वी को धन्यवाद...कुछ बातों लम्हो की कोई कीमत नहीं होती है....अगर आप अपने ललम्हो को फिर से जी रहे है और उसे लिख रहे है याद कर रहे है बेटा help कर रहा है और क्या चाहिए सर....जिंदगी में इस पोस्ट को लिखने से आपको शायद कुछ न मिले ज्यादा लोग इसे पढ़े भी न और देखे भी न लेकिन इसे लिखने और सबके सामने रखने के बाद इसको आपके मन का सुकून संतोष जो है वही आपका प्रतिफल है
ReplyDeleteआपको साधुवाद और धन्यवाद जो आपने ये किया क्योकि सपने हमेशा जिन्दा ररहने चाहिए जीवन कैसे भी चले....
बस से 22 दिन की परिवार के साथ यात्रा जिस समय न इतनी इलेक्ट्रिसिटी5 और न ही इतने उत्तम road थे आपने की और गुना के पास रात को चादर बिछा कर सोये....जीवन के अनमोल लम्हे यादे बन आज सामने आ खड़े है आपके
बेहद उम्दा इस याद की इन लेख की जितनी तारीफ़ की जाए वो कम है क्योकि बड़ा मुश्किल भी है और हसीं भी है यादो को फिर से जीना
आपके बाकी के लेख का मुझे जरूर इंतजार रहेगा सर धन्यवाद दिल से